सोमवार, अगस्त 15, 2011

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए...

आज आज़ादी के 64 साल के बाद अपनी सूरते-हाल पर शर्मिंदा होने के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं है। देश की अधिकाँश जनता एक वक़्त की रोटी के लिए मोहताज़ है लेकिन लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ रहा हैवो अनाज किस काम का जो भूखे का निवाला न बन सके, वो प्रशासन किस काम का जो रोटी होते हुए जनता को भूख से मरने के लिए मजबूर कर दे।और भूखा यदि रोटी की गुहार करे तो उसे गोली खिलाये, कभी आश्वासन की,तो कभी बन्दूक कीसत्ता आपके पास है, कानून आपके हाथ में है , आप जैसा चाहें उसे तोड़ें,मरोड़ें, मखल उड़ायें, गरीब को, असहाय को उसकी नोक पर रख रोंदेलाखों-करोड़ों के घोटालों को जांचने के लिए के लिए सरकार के न तो समय है न इच्छा-शक्ति, उनका तंत्र, कानून व बल का प्रयोग केवल विरोधियों को ठिकाने लगाने का कार्य ही कर सकता है।सर्व-विदित है कि  बाबा रामदेव को सरकार ने अन्ना हजारे के विरुद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल के लिए तैयार करने की कोशिश की थी, उन्हें VVIP ट्रीटमेंट दिया गया लेकिन जब योजना कामयाब नहीं हुई तो रात को सोती निहत्थी जनता पर लाठियां बरसाई और फिर उनके सहयोगियों व उनके ट्रस्टों पर सीबीआई,इडी आदि की गहन जांच बैठाई

बिलकुल कानून के तहत
जांच होनी चाहिए, लेकिन आम जनता यह जानने का हक रखती है:
 - कि  ये सब तो पहले भी था और सरकार की मिली-भगत के बगैर क्या यह संभव था?
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क्यों न जनता यह निष्कर्ष निकाले कि इस देश में कोई भी गैर कानूनी कार्य तब तक कर सकता है जब तक वह सरकार का विरोध न करे या सरकार की हर हाँ में हाँ मिलाता रहे?


सरकार की नेक-नियति तब समझ में आती जब आन्दोलन के प्रमुख मुद्दे यानि  देश के बाहर व देश के अन्दर जमा काले धन पर भी जांच उसी जोशो-खरोश से होती और कोई सार्थक नतीजे सामने आते बेशक उसमें रामदेव ही क्यों न फंसते लेकिन ऐसा लगता है कि जांच एजेंसियां (अगर वो वास्तव में कहीं जांच कर रही हैं तो ) तब अपनी रिपोर्ट नहीं देगी जब तक उन बैंको में जमा पैसा कहीं और स्थानांतरित नहीं हो जाता
    
 
आज अन्ना सरकारी लोकपाल का विरोध कर रहें हैं ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके तो उन पर तरह-तरह से बंदिशें लगा कर अनशन करने के लिए हतोत्साहित किया जा रहा है सरकार द्वारा भ्रष्ट करार दिया जा रहा है, कह रहें है कि वो भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं और उनको इस मुद्दे पर अनशन करने का कोई हक नहीं है, तो जनता यह भी जानना चाहती है कि पूरी तरह भ्रष्टाचार के भंवर में फंसी सरकार किस नैतिक आधार पर देश पर शासन कर रही है

गोडसे ने गाँधीजी की हत्या की जिसे किसी भी दृष्टिकोण से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इन पिछले 63 सालों से उनके आदर्शों की हत्या यदि उस वर्ग द्वारा की जा रही हो जो रात-दिन उनकी धुहाई देता रहा हो, उसका क्या? देश के कर्णधारों व योजनाकारों के लिए गांधीजी का मूल-मंत्र था - जब भी कोई कानून बने या योजना बने तो सबसे निचले स्तर पर जी रहे नागरिक के हितों को देखते हुए बने और उसका लाभ उस तक पहुंचे भी लेकिन आज़ादी के 64 सालों के बावजूद भी यह गरीब-अमीर की खाई बढती ही जा रही है।सारा पैसा कुछ ही प्रतिशत लोगों के भीतर सिमट कर रह गया हैचंद सालों में कुछ लोग करोड़ों रूपये कमा लेते हैं लेकिन वो पैसा कैसे कमाया गया यह जानने की कोशिश कोई नहीं करता और कानून के दाव-पेंच लगा कर वे लोग मुक्त हो जाते हैं और सरकारें कैसे मूक दर्शक बनी देखती रहती हैं? क्या भ्रष्टाचार बिना सरकारी तंत्र के सहयोग के संभव है?यह कैसा गांधीवाद है?


रावलगाँव सिद्धि में रामराज्य का सपना साकार करने वाले, अपना सब कुछ त्याग कर, समाज सेवा में जुटे संत स्वरुप अन्ना को कलंकित करने की कोशिश कर रहे लोगों को क्या कहा जाय यह सोच कर खुद को ही शर्मिंदगी महसूस होती है। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। कंप्यूटर साइंस व रोबोटिक्स में Artificial Intelligence पर अनुसन्धान कर रहे लोगों के लिए अच्छा विषय हो सकता है यदि वे दूसरी दिशा से रिसर्च शुरू करें यानि यह जानने की कोशिश करें कि मानव मष्तिष्क से जमीर (Conscience)  व संवेदनशीलता ( Sensitivity) निकल जाए तो वो किस तरह व्यवहार करेंगे, हमारे यहाँ से लोगों की पूरी जमात है

आज अन्ना को वो लोग मुखोटा बता रहें हैं जिनका अपना कोई चेहरा नहीं है अन्ना आम आदमी के लिए कोई इंसान नहीं हैं, सदियों से गुलामी की ज़ंजीर में जकड़े, तथाकथित आज़ादी के बाद भी सरकार व उसके तंत्र की अकर्मण्यता व भ्रष्टाचार के पाटों के बीच फंसी निरीह जनता के पथराई आँखों व थमती साँसों के बीच खुशगवार जिन्दगी जीने के सपने की झलक हैं                

सरकार के वरिष्ट मंत्री कहतें है कि अन्ना संविधान की जानकारी नहीं रखते, मान लिया,लेकिन आप तो रखते हैं, आपने क्या किया? प्रतिभा का इस्तेमाल जन-मानस के उद्धार के लिए किया जाता है तो व्यक्ति देवता बन जाता है लेकिन उस प्रतिभा को क्या कहें जो भ्रष्टाचारियों के बचाव में खड़ी नज़र आती हो।हिंदी साहित्यकार पद्मभूषण विष्णु प्रभाकर जी ने कहा है -

चुके हुए लोगों से
खतरनाक हैं
बिके हुए लोग
वे
करते हैं व्यभिचार
अपनी ही प्रतिभा से !


इस संवेदनहीनता से आम आदमी आहत है।सरकार के भ्रष्टाचार से निपटने के ढुल-मुल रवैये से निचले स्तर की अफसरशाही व कर्मचारी भी अब बेखौफ हैंपहले जब किसी अफसर या कर्मचारी को भ्रष्टाचार में लिप्त पकड़ लिया जाता था तो उसे थोड़ी-बहुत शर्मिंदगी महसूस होती थी लेकिन अब वे न केवल डंके की चोट पर भ्रष्टाचार करते हैं बल्कि ईमानदार कर्मचारियों का मजाक उड़ाया जाता है,उनको प्रताड़ित किया जाता है।क्यों कि वे अपने से ऊपर बैठे लोगों का अनुसरण करते हैंसोचतें हैं जब उनका कुछ नहीं होता तो हमारा क्या होगा और यदि कुछ हुआ तो रिश्वत ली है तो देकर छूट भी जायेंगे और से लोग बहुतायत में हैंआज शर्मिंदा वे लोग हैं जो बदकिस्मती से बेईमान नहीं बन सकते

आम आदमी सुबह घर से निकल सड़क पर आता है और रूबरू होता है अनेक गड्डों से, यदि रोज़मर्रा के आने जाने की सड़क हो तो उसे अंदाज़ा  होता है कि गड्डे कहाँ-कहाँ हो सकते हैं सो किसी तरह बच जाता है यदि चूक गया या रूट रोज़मर्रा का न हो तो या तो वो खुद चोट खायेगा या वहिकलइससे कितना नुकसान होता है भुक्तभोगी जानतें हैंलेकिन ठेकेदार-इन्जीनिअर-नेताओं की कारगुजारी व मिलीभगत जिसकी वजह से ये दुर्दशा होती है उसके लिए बस हम अपने को कोस कर रह जातें हैं

और भ्रष्टाचार का ये कुचक्र निरंतर चलता रहता है अनेक रंगों में,अनेक रूपों में, अनेक वेशभूषाओं में, अनेक प्रकरणों में  - 7 X 24
  

40 वर्षों के बाद भी कवि दुष्यंत कुमार की पुकार जस की तस है -


 
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए


आज यह दीवार,पर्दों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी क
ि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में,हर नगर,हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए 


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है क
ि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी, लेकिन आग जलनी चाहिए

शुक्रवार, अगस्त 12, 2011

चलो बस चलो


अपने को शर्मिंदा करके कहाँ चले हो,
आओ घर के भीतर बैठें होकर शर्मिंदा।
आज इनको सपने दिखा लुभा रहे हो,
कल किश्तें मांग-मांग कर करोगे शर्मिंदा।
बिस्तर पर पड़े-पड़े हम हैं शर्मिंदा,
लोन चुकाने के चक्कर में हो गए बीमार।
उसे क्या जलाओगे जो जलकर राख हुआ,
तो फिर तुम अपने हाथ उसी राख से मलोगे
आओ जिस-जिसको भूख सताती है,
यहाँ लोन देने का बड़ा बाज़ार सजा।
हड़ताल पर क्यूँ बैठे हो,
सरकार दे रही है लोन खुला।
आज लोन है खुला बंट रहा,
कल किश्तों में कर देंगे अदा।
काल को हमने बस में है कर लिया
कल जियेंगे और कमाएंगे,
इतना है हमें पता।
चलिए जो होगा देखा जाएगा,
अब कहाँ बची है शक्ति भुझते हुए चिरागों में।
तन जलता है मन जलता है
उत्तर-दक्षिण पूरब-पश्चिम,
आग में सुलगता है।
चले चलो,चले चलो जब तक जीवन है,
जान है तो जहान है फिर तो श्मशान है।
यह मेरा गणतंत्र-जनतंत्र महान है,
आओ सूर्य की नई किरण आओ।
स्वागत है,
तुम तो ऊपर अभी नहीं चढ़ रहीं,
आओ धरा पर पड़ी राख को,
दे सको तो दे दो,
फिर से जीवन नया।
क्या कोई यहाँ पर है,
क्या कोई हमारी सुन रहा,
चारदीवारी में बंधे-बंधे
बिस्तर पर पड़े-पड़े,
तन जल रहा मन जल रहा
आओ भाई आओ भाई,
इसी राह पर अब तो है चलना।
चलो बेटा चलो,
माँ का हाथ पकड़ कर चलो,
हँसते-हँसते चलो,
चलते-चलते चलो,
बाहर रोशनी में चलो,
हम भी रोशनी में चलें,
तुम भी रोशनी में चलो।
उठो खड़े होओ,
बस चलो। 

  - विष्णु प्रभाकर   (१५.०३.२००९)

शनिवार, जुलाई 30, 2011

मरती है मृत्यु ही बार-बार

मृत्यु -पथ पर जाते हुए
पूछ लिया मैंने स्वयं मृत्यु से
तुम नहीं मरती क्या कभी?
चौंकी नहीं वह, हँस आई ...
फिर आह भर कर बोली -
भोले प्राणी, वह मैं ही तो हूँ जो
मरती हूँ बार-बार
मुक्त करने को तुम्हें
मृत्यु-लोक के छल-प्रपंचों से
कथनी-करनी के अंतर से
जो नहीं हो, वही दीखने के जघन्य पाप से
जिसे मानते हो विधाता, उसी को बंद कर देते हो
मंत्रो में, आयतों में
काँकर-पाथर के पूजाघरों में
और ठगने के गुनाह से बच जाते हो उसी को
जो तुम्हारा सबसे अपना है

तुम करते हो घोषणा बार-बार
दर्द भरे शब्दों में
शराब, सिगरेट, जुआ, लाटरी
सब घातक हैं
तन के लिए, मन के लिए और धन के लिए
त्याग दो, त्याग दो उन्हें इसी क्षण
और
फिर खोलते हो मदिरालय
छपवाते हो सुनहरी इश्तिहार
जिनमें पिलाती हैं रमणियाँ
सुगन्धित सिगरेट - प्रेमियों को
दे देते हो अनुमति
चलाने को नाना-रूप लाटरियाँ
बनाने को सबको निर्धन, निर्भर
अर्थ बदल दियें हैं तुमने !
कर दिया है महिमा-मंडित
गुंडों, बदमाशों और विश्वासघातियों को
इन सब जघन्य पापों से बचाती हूँ
मैं ही तुम्हें बार-बार
और मरती हूँ निरंतर स्वयं
तुम्हारे विश्वासघातों की
शिलाएँ धरकर
अपनी छाती पर ।

                      -विष्णु प्रभाकर (दिसंबर १९९४)

काव्य-संकलन "चलता चला जाऊँगा" के प्राक्कथन में विष्णु जी के सुपुत्र अतुल जी ने उनकी डायरी का उल्लेख किया है जिसमें विष्णु जी ने लिखा है, "जब कुछ नहीं आता था तो कुछ करने के लिए कविताएँ लिखीं, जब सब कुछ करके देख लिया तो कविताएँ लिखीं।कविताएँ क्या पलायन हैं या थके मन के लिए टानिक ।"

मेरे लिए ये यथार्थ का आइना दर्शाती उस नश्तर की तरह हैं जो चुभन के साथ मन-मष्तिष्क में घर कर गए रोगों के लिए प्रतिरक्षण का कार्य करता है।  

रविवार, जुलाई 17, 2011

विष्णुजी की कहानियों का नाट्य मंचन

दिनांक १४ जुलाई  २०११, सायंकाल
'मुक्तधारा' प्रेक्षागृह, भाई वीर सिंह मार्ग,
गोल मार्केट नई दिल्ली - ११०००१,
में विष्णुजी की कहानियों -

'धरती अब भी घूम रही है',
'डायन', व 'कितने जेब कतरे'

पर आधारित नाटकों का मंचन, 'रंगसप्तक' के तत्त्वावधान में श्री सुरेन्द्र शर्मा की परिकल्पना व निर्देशन में सम्पन्न हुआ!

 
सभागार में विष्णु साहित्य प्रेमी,अनेक साहित्यकार, रंगमंच से जुडी हस्तियाँ व अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे!

 मंच की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत हैं -


उपरोक्त चित्र विष्णुजी के सुपुत्र श्री अतुल कुमार के सौजन्य से प्राप्त हुए!

मंगलवार, जुलाई 12, 2011

आमंत्रण


स्वर्गीय श्री विष्णु प्रभाकर की जन्म शती के अवसर पर रंगसप्तक की प्रस्तुति
 
धरती अब भी घूम रही है ...

परिकल्पना व निर्देशन सुरेन्द्र शर्मा

स्थान -  मुक्तधारा प्रेक्षागृह
         भाई वीर सिंह मार्ग
                     गोल मार्केट , नई दिल्ली ११०००१

दिनांक १४ जुलाई २०११
समय सांय ६:०० बजे

सहयोग साहित्य कला परिषद, दिल्ली

निशुल्क प्रविष्ट

आम आदमी की त्रासदी व नेपथ्य की आवाजें

देश व परिवेश के लगातार बिगड़ते हालातों, सत्तारुढ व सत्ताविहीन राजनेताओं के तांडव,चापलूस-मौकापरस्त नौकरशाहों के भ्रष्ट तन्त्र के दावानल से बचता भागता “आम आदमी” ऐसे दलदल में जा गिरा है जहाँ छटपटाहट के सिवा उसके पास कुछ नहीं है...

असहाय, लाचार धीरे-धीरे धंसता जा रहा है...

उसे अब चेहरे नहीं सिर्फ धुंधली परछांईयां नज़र आती हैं और सुनायी दे रही है सिर्फ भेडिओं की गुर्राहट व लकडबग्गों की विद्रूप हंसी..


कहावत है कि “हम किसी को एक दिन बेवकूफ़ बना सकते हैं या दो दिन लेकिन हमेशा के लिए नहीं”. किन्तु राजनेताओं ने ऐसे फ़ार्मुले इज़ाद कर लिए हैं जिनके इस्तेमाल से जनता को हमेशा के लिए व कारगर तरीके से बेवकूफ़ बनाया जा सकता है और वो बना रहे हैं व हम बन रहे हैं
.
रेल दुर्घटना हो या सड़क, हत्या हो या बलात्कार या भ्रष्टाचार,सब सहज है, सब आम है.
समाधान कुछ नहीं,बस लीपापोती,घडियाली आंसू व कुछ देर के लिए सामूहिक कोहराम है.

बानगी देखिये –

- दिल्ली पुलिस कमिश्नर कहते हैं महिलाएँ रात में न निकलें, यदि ज़रुरी हो तो किसी को साथ लेकर निकलें. बिल्कुल सही है व ऐसा होना भी चाहिए और ऐसा होता भी है. हालातों को देखते समझते यदि कोई महिला ऐसा करती है तो ये उसकी बहुत बड़ी मज़बूरी होगी या दुस्साहस.लेकिन जो कुकृत्य दिन के उज़ाले में व सबके सामने होतें हैं उनका क्या?

- “कालका मेल” रेल दुर्घटना में मृतकों का आंकडा सैकडे के पास पहुँच गया है. ये दुर्घटना भी रात के अँधेरे में या कोहरे में नहीं हुई.दूसरी दुर्घटना भी असम में उसी दिन हुई.इन्कवारियों का दौर चलेगा.उच्च स्तर पर जाँच की जायेगी.सच्चाई चाह कर भी सामने नहीं आपाएगी क्यों कि हमारी आदत है लीपापोती की, अपनों को बचाने की.सबके अपने बच जायेंगे.फंसेगा वो जिसका कोई माई-बाप नहीं या जिसका कोई दूसरा जुगाड़ नहीं. उसी के गले में माला पहना दी जायेगी.सब भूल जायेंगे कि सैकडों लोग कई दशकों या ताउम्र उस त्रासदी को झेलेंगे व जियेंगें.और हम सब इंतज़ार करेंगे अगली त्रासदी का...

कोई फर्क नहीं पड़ता कि रेल मंत्री लालू हों या ममता बनर्जी,या अब कोई और.मकसद केवल निहित स्वार्थ. हाँ यदि इसमें कुछ जनता का भला हो जाता है तो प्रभु की माया.

- दिग्गी राजा के लिए सत्याग्रही “नौटंकीबाज” हैं व ओसामा बिन लादेन - “जी”. पत्रकार सभा में एक आम आदमी ने केवल जूता दिखाया तो दिग्गी राजा ने उसे लातों से चमकाया. अब उन्हें २-G स्पेक्ट्रम व CWG में कोई भ्रष्टाचार नज़र नहीं आ रहा. उनके सारे साथी निर्दोष हैं जैसा की कई मंत्रीगण पहले ही कह चके हैं.तो फिर क्या समझा जाय, ये सब कोर्ट-कचहरी, हवालात सब की सब “नौटंकी” है.लोग कह रहे है कि ये बडबोले हैं, जो जी में आता है बोल देते हैं.समझ से परे है.जिस पार्टी में परिवारवाद व वंशवाद कि परम्परा रही हो,साँस लेने से पहले आका कि इज़ाजत लेनी होती हो, वहाँ कैसे कोई अपनी जबान बोल सकता है?


“आम आदमी” अभिशप्त है इस “तंत्र के बेताल” को ढोने के लिए..
हमेशा की तरह, हमेशा के लिए...

बेताल उसे थकान व बोझ को भुलाने के लिए कहानियाँ सुनाएगा,सब्ज़बाग दिखायेगा,लेकिन उसे छोडेगा नहीं.

... अचानक एक आवाज़ नेपथ्य में गूंज उठी, ध्यान से सुनो,शायद आपको भी सुनाई दे...
मुझे सुनाई दे रही है,


कवि “धूमिल” हैं –

नहीं – अपना कोई हमदर्द
यहाँ नहीं है. मैंने एक-एक को
परख लिया है.
मैंने हर एक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाज़ा खटखटाया है.
मगर बेकार...
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ये सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं.
वे वकील हैं.वैज्ञानिक हैं.
अध्यापक हैं.नेता हैं.दार्शनिक
हैं.लेखक हैं.कवि हैं.कलाकार हैं.
यानि कि-
कानून कि भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का संयुक्त परिवार है. 
 
नव भारत टाइम्स में ब्लाग 'कलम' देखें -
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/kalam/entry/